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Bihar Politics News: उपेंद्र कुशवाहा के सामने RLM में संकट, 4 में से 3 विधायकों की नाराजगी से बढ़ी मुश्किल

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी RLM में तीन विधायकों की नाराजगी से सियासी संकट गहराया। जानिए दल-बदल कानून और दो-तिहाई विधायकों के गणित का पूरा मामला।

पटना, 14 अक्टूबर: बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के भीतर उठे मतभेद अब पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बनते दिख रहे हैं। पार्टी अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से एनडीए के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ रहे राम पुकार सिन्हा को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है। लेकिन इस कार्रवाई के बाद विवाद थमने के बजाय तीन विधायकों की भूमिका के कारण और गहरा गया है। 

मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि RLM के चार विधायकों में से तीन—माधव आनंद, रामेश्वर महतो और आलोक कुमार सिंह—राम पुकार सिन्हा के समर्थन में सामने आए थे। इससे पार्टी के भीतर नेतृत्व और विधायकों के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए। अब राजनीतिक नजरें इस बात पर हैं कि कुशवाहा इन विधायकों के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कदम उठाते हैं या बातचीत से विवाद सुलझाने की कोशिश करते हैं। 

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?


बिहार विधान परिषद की सारण शिक्षक सीट के चुनाव में एनडीए ने जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के आनंद पुष्कर को अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया है। इसके बावजूद RLM के नेता राम पुकार सिन्हा निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतर गए। पार्टी नेतृत्व ने इसे गठबंधन और संगठनात्मक अनुशासन के खिलाफ कदम माना और उनके विरुद्ध कार्रवाई की।


हालांकि, सिन्हा के समर्थन में तीन विधायकों के सामने आने से मामला केवल एक प्रत्याशी के निष्कासन तक सीमित नहीं रहा। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और दिनारा से विधायक आलोक कुमार सिंह, मधुबनी के विधायक माधव आनंद और बाजपट्टी के विधायक रामेश्वर महतो की भूमिका ने नेतृत्व के सामने संख्या बल से जुड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

चार में तीन विधायक नाराज, नेतृत्व के सामने दोहरी चुनौती


RLM के पास विधानसभा में कुल चार विधायक हैं। ऐसे में तीन विधायकों का असंतोष पार्टी की राजनीतिक स्थिति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। यदि कुशवाहा उनके खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो संगठन के भीतर टकराव और बढ़ने की आशंका रहेगी। दूसरी ओर, कार्रवाई नहीं करने पर नेतृत्व के अनुशासनात्मक फैसले की प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं।


यह विवाद एनडीए के लिए भी असहज स्थिति पैदा करता है। गठबंधन के सहयोगी दलों से अपेक्षा रहती है कि वे विधान परिषद चुनाव में घोषित उम्मीदवारों का समर्थन करें। तीन RLM विधायकों की अलग स्थिति ने गठबंधन के भीतर समन्वय और एकजुटता पर चर्चा तेज कर दी है। अक्टूबर की शुरुआत में तीनों विधायकों के एनडीए की एक बैठक में शामिल नहीं होने की खबरें भी सामने आई थीं।

दल-बदल कानून में क्या है प्रावधान?

इस पूरे विवाद में संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून का जिक्र महत्वपूर्ण है। लेकिन पार्टी नेतृत्व से असहमति जताना, किसी नेता का समर्थन करना और विधानसभा में पार्टी के निर्देश के विरुद्ध मतदान करना एक जैसी परिस्थितियां नहीं हैं।


दल-बदल कानून के तहत किसी विधायक की सदस्यता पर सवाल तब उठ सकता है, जब उसके आचरण पर संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधान लागू हों। केवल पार्टी से निष्कासन कर देने से विधानसभा की सदस्यता अपने आप समाप्त नहीं होती। अयोग्यता का प्रश्न संबंधित तथ्यों और संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर तय होता है।


इसलिए RLM के तीन विधायकों ने राम पुकार सिन्हा का समर्थन किया है, सिर्फ इसी आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो जाएगी। यह देखना होगा कि उन्होंने क्या कदम उठाए हैं और क्या वे दल-बदल कानून के किसी प्रावधान के दायरे में आते हैं।


क्या तीन विधायक मिलकर दूसरी पार्टी में जा सकते हैं?


यह विवाद का सबसे संवेदनशील कानूनी पहलू है। वर्ष 2003 में संविधान के 91वें संशोधन के बाद दल-बदल कानून में पहले मौजूद एक-तिहाई विधायकों के आधार पर अलग समूह बनाने वाली छूट समाप्त कर दी गई थी।


विलय से संबंधित अपवाद के लिए संबंधित विधायक दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति आवश्यक होती है। RLM के चार विधायकों में दो-तिहाई से अधिक की सीमा पूरी करने के लिए कम-से-कम तीन विधायकों का समर्थन चाहिए। लेकिन केवल तीन विधायकों का साथ आ जाना या किसी दूसरे दल में शामिल होने की घोषणा कर देना अपने आप कानूनी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। राजनीतिक दल के विलय और दसवीं अनुसूची की संबंधित शर्तों को भी पूरा करना पड़ता है।


इसलिए तीन विधायकों की एकजुटता कुशवाहा के लिए राजनीतिक चुनौती जरूर है, लेकिन इससे पार्टी के कानूनी भविष्य पर अपने आप अंतिम फैसला नहीं हो जाता।


कुशवाहा के सामने कौन-से विकल्प हैं?


पहला विकल्प बातचीत का है। कुशवाहा नाराज विधायकों से चर्चा कर सकते हैं और पार्टी के भीतर मतभेद दूर करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसा होने पर विवाद को बढ़ने से रोका जा सकता है और एनडीए के साथ तालमेल बनाए रखने में मदद मिल सकती है।


दूसरा विकल्प अनुशासनात्मक कार्रवाई का है। लेकिन इस रास्ते पर आगे बढ़ने से पहले पार्टी नेतृत्व को राजनीतिक नतीजों और कानूनी प्रक्रियाओं का आकलन करना होगा। कठोर कदम उठाने से संगठन में विरोध बढ़ सकता है, जबकि कोई कदम नहीं उठाने से नेतृत्व की सख्ती पर सवाल खड़े हो सकते हैं।


तीसरा पहलू एनडीए के भीतर RLM की भूमिका का है। छोटे सहयोगी दलों के लिए विधायकों की संख्या और गठबंधन के साथ तालमेल दोनों अहम होते हैं। इसलिए कुशवाहा के सामने केवल पार्टी का आंतरिक विवाद सुलझाने की चुनौती नहीं, बल्कि गठबंधन में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत बनाए रखने का सवाल भी है।


अब आगे क्या होगा?


फिलहाल इस घटनाक्रम का केंद्र तीनों विधायकों और पार्टी नेतृत्व के बीच जारी मतभेद हैं। राम पुकार सिन्हा के निष्कासन के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि RLM नेतृत्व उनके समर्थक विधायकों को लेकर क्या रुख अपनाता है और क्या दोनों पक्षों के बीच समझौते की कोई राह निकलती है।


हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पार्टी में निश्चित रूप से टूट होगी या किसी विधायक की सदस्यता समाप्त हो जाएगी। ऐसे निष्कर्ष के लिए आगे के राजनीतिक कदमों और कानूनी स्थिति को देखना जरूरी है।


RLM का यह विवाद बिहार की राजनीति में संख्या बल, संगठनात्मक अनुशासन और गठबंधन की मजबूरियों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को सामने लाता है। उपेंद्र कुशवाहा के लिए असली परीक्षा यह होगी कि वे पार्टी की एकजुटता बनाए रखते हुए तीनों विधायकों की नाराजगी को कैसे संभालते हैं। आने वाले दिनों में उनका फैसला RLM के भीतर नेतृत्व की पकड़ और एनडीए के साथ उसके तालमेल की दिशा तय करने में अहम हो सकता है।

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